30 दिसंबर, 2010

 हौसले बुलंद हों तो सपने भी सच होते हैं
सिर्फ तीन साल पहले की ही तो बात है, जब असम के 33वें नेशनल गेम्स में छत्तीसगढ़ के खेल जगत ने सपना देखा था नेशनल गेम्स की मेजबानी का। छत्तीसगढ़ ने कई खेलों में पात्रता हासिल कर असम नेशनल गेम्स में हिस्सा लिया था। तब असम की खेल अधोसंरचनाओं ने सभी को अचंभजीत कर दिया था। भले उनके पास बेहतर खिलाड़ी न रहे हों लेकिन खेल की बुनियादी सुविधाएं देखकर सभी की आंखें फटी रह गई थीं। यह नेशनल गेम्स की मेजबानी लेने का ही चमत्कार था जिसने असम को पूरे देश में ख्याति दिला दी थी। पूरा असम खेलों की दीवानगी में डूब गया था। हर शख्स नेशनल गेम्स के खेलों को देखने बेताब रहता था। एक आम रिक्शा चालक ही क्यों न हो, कई किलोमीटर लंबी कतारें लगती थीं दर्शकों की। वह असम जहां उलफा ने अशांति फैला रखी थी, एकदम शांत हो गया था और एक आम असमिया भी देर रात तक मुकाबले देखने में व्यस्त रहता था। जाहिर है खेल से अपराध कम होते हैं फिर चाहे वर्ल्ड कप क्रिकेट का मामला हो या नेशनल गेम्स का, क्राइम रिपोर्ट सामान्य दिनों की अपेक्षा (सट्टेबाजी को छोड़कर) नील ही रहती है। यह असम के राष्ट्रीय खेलों ने साबित कर दिखाया था। वह असम जो राष्ट्रीय स्तर की खेल स्पर्धाओं में कभी ज्यादा पदक हासिल नहीं कर पाता था,  लेकिन 33वें नेशनल गेम्स का मेजबान बना तो उसने 38 स्वर्ण, 53 रजत और 57 कांस्य  पदक हासिल कर पदक तालिका में तीसरा स्थान बना लिया। असम के खेल इतिहास में यह सबसे बड़ी उपलब्धि थी। असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का उस समय बयान था- नेशनल गेम्स के आयोजन से असम में खेल अधोसंरचना का जो विकास हुआ है उसका फायदा आने वाले कई सालों तक हमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलता रहेगा और इसमें कोई दो मत नहीं है कि खेल शांति का सबसे बेहतर माध्यम है। उस समय असम में मौजूद छत्तीसगढ़ का हर खिलाड़ी और छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ के पदाधिकारियों का भी सपना था कि ऐसे ही दृश्य एक दिन छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिलेंगे। हां, यह सपना इतनी जल्दी पूरा होने की राह पर होगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण को सिर्फ नौ साल ही हुए हैं और यह दसवां साल चल रहा है। हमारी उम्र कम है लेकिन हौसले इतने बुलंद हैं कि कोई भी करिश्मा असंभव नहीं। यही करिश्मा छत्तीसगढ़ सरकार ने 37वें नेशनल गेम्स की मेजबानी लेकर कर दिखाया है। प्रदेश के खेल जगत ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि का श्रेय मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और खेल मंत्री लता उसेंडी को दिया है। खेल मंत्री लता उसेंडी कभी जगदलपरु के मैदान में कार्क बॉल से क्रिकेट खेला करती थीं। आज भी उन्हें कार्क बाल से ही खेलना पसंद है न कि टेनिस बाल क्रिकेट से। जाहिर है उनका मनोबल मजबूत है। कभी उन्होंने भी सोचा नहीं था कि वे राज्य के लिए नेशनल गेम्स की मेजबानी का आधार बनेंगी। वे भी काफी खुश हैं। कहती हैं कि नेक इरादे के साथ कोई भी मंजिल हासिल की जा सकती हैं और राज्य के खेल जगत के लिए इस ऐतिहासिक दिन की उपलब्धि तभी  मानी जाएगी जब नेशनल गेम्स का सफल आयोजन हम करके दिखाएंगे।  नि:संदेह उनके बुलंद हौसलों ने राज्य के खेल जगत का नेशनल गेम्स की मेजबानी हासिल करने का सपना भी पूरा कर दिखाया। मेजबानी पर अरमानों के पंख तो उस दिन ही लग गए थे जब छत्तीसगढ़ सरकार ने नेशनल गेम्स की दावेदारी के लिए विधिवत आवेदन के साथ भारतीय ओलंपिक संघ को 50 लाख रुपए दिए। पिछले साल अक्टूबर माह में दिल्ली में हुई भारतीय ओलंपिक संघ की कार्यकारिणी और आमसभा  की बैठक में छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ ने जिस दावेदारी के साथ मेजबानी हासिल की, वह काबिले तारीफ थी। छत्तीसगढ़ ने दावेदारी जीतकर दिखा दी। क्योंकि हौसले बुलंद और इसलिए भी कि छत्तीसगढ़ सरकार राज्य ओलंपिक संघ के साथ थी। सरकार ने मेजबानी के लिए दो करोड़ रुपयों के प्रस्ताव पर भी मुहर लगा दी। सारे रास्ते एक के बाद एक बनते चले गए। स्वयं भारतीय ओलंपिक संघ के आजीवन अध्यक्ष विद्याचरण शुक्ल ने भारतीय ओलंपिक संघ के पदाधिकारियों से दिल्ली में चर्चा की और मेजबानी के लिए दबाव भी बनाया। फिर भला भारतीय ओलंपिक संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विजय मल्होत्रा के सहयोग को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता। ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ का विपक्ष साथ नहीं है। होस्ट सिटी कांट्रेक्ट पर हस्ताक्षर के बाद पूरे देश की मीडिया के सामने सात मिनट की वीडियो क्लीपिंग भी दिखाई गई। इस क्लीपिंग में छत्तीसगढ़ में राज्य निर्माण के बाद हुए विकास कार्यों के अलावा राज्य के सत्ता पक्ष और विपक्ष के बयान  हैं जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ को नेशनल गेम्स का मेजबान बनाने की बातें कही हैं और सभी को इस आयोजन को साथ मिलकर सफल बनाने का आव्हान किया है। इसी एकता  की जररूत हमें नेशनल गेम्स के पहले अधोसंरचना के विकास के लिए  पड़ेगी। जिससे हमारे बुलंद हौसलों पर कोई आंच न आने पाए। खेल विशेषज्ञ कहते हैं कि बिना सरकार के सहयोग के नेशनल गेम्स का आयोजन किसी भी राज्य के ओलंपिक संघ के लिए संभव नहीं है। राज्य के खेल जगत की किस्तम बेहतर है कि सरकार खेलों को तवज्जो दे रही है, वरन दूसरे राज्यों में खिलाड़ियों को किसी राष्ट्रीय स्पर्धा में हिस्सा लेने के लिए भी अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। खैर, हम लौटते हैं नेशनल   गेम्स की तरफ जिसके आयोजन से राज्य की तस्वीर बदल जाएगी। खासतौर पर होस्ट सिटी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की। जैसा कि भारतीय ओलंपिक संघ के आजीवन अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी होस्ट सिटी कांट्रेक्ट पर हस्ताक्षर करने के बाद कहते हैं कि कॉमनवेल्थ गेम्स से जिस तरह दिल्ली की तस्वीर बदली है उसी तरह रायपुर की तस्वीर भी बदल जाएगी। जाहिर है राजधानी में कई खेलों के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के स्टेडियम बन जाएंगे। इतना ही नहीं शहर की कई और बुनियादी सुविधाओं में इजाफा् होगा। लेकिन राज्य के कुछ दूसरे जिलों को भी मेजबानी का मौका देना होगा जिससे प्रदेश के दूरस्थ इलाकों में भी खेल की सुविधाओं का विस्तार हो सके। लेकिन यह तभी  सभव हो पाएगा जब हम एक घंटे की तय सीमा को पूरा कर पाएंगे। नेशनल गेम्स के खेलों का आयोजन उन स्थानों में कराया जाना संभावित है, जहां मुख्य आयोजन स्थल से एक घंटे की समयावधि में पहुंचा जा सकता है। जाहिर है हमें दूरस्थ इलाकों के विकास के लिए हैलीकाप्टर से खिलाड़ियों को पहुंचाना पड़ेगा और कोई चारा नहीं। लेकिन इसके लिए  चाहिए बुलंद हौसले जिससे यह सपना भी पूरा किया जा सके।
विशेष लेख-कमलेश गोगिया ( खेल पत्रकार- नेशनल लुक )

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