06 जनवरी, 2011

.... और लुप्त हो गई धर्नुविद्या

छत्तीसगढ़ के द्रोणाचार्य को नहीं मिला एक भी अर्जुन

रायपुर, ५ जनवरी. २०११. : छत्तीसगढ़ के लिए यह अफसोस की ही बात होगी कि हमारे पास प्राचीन धर्नुविद्या की कला मौजूद थी लेकिन हम उसे गवां बैठे। छत्तीसगढ़ के द्रोणाचार्य कोदूराम वर्मा को 86 साल की आयु तक एक भी अर्जुन नहीं मिला। अब वे इस विद्या को वे सिखाने में सक्षम नहीं हैं और न तो वे शब्दभेदी बाणों का प्रदर्शन कर पाते हैं। उन्हें इस बात का अफसोस है कि उनके परिवार के लोगों ने भी यह विद्या नहीं सीखी।
शब्दभेदी बाण में माहिर धर्नुविद्या के महारथी दुर्ग जिले के भीमौरी गांव में रहने वाले कोदूराम वर्मा को यहां आल इंडिया इंटर रेलवे आरचरी चैंपियनशिप के समापन समारोह में सम्मानित किया गया। सहज और सरल स्वभाव  के कोदूराम से पत्रकारों ने खूब सवाल किए और उन्होने  बखूबी सहजता के साथ जवाब भी दिया। उन्होंने इस बात को लेकर अफसोस जताया कि उनकी यह विद्या अब किसी काम की नहीं रही। उन्होंने काफी  प्रयास किया कि एक तो युवा ऐसा मिले जो चाय, तम्बाकू, सिगरेट, शराब न पीता हो और इस विद्या को सीखने ललायित हो। लेकिन ऐसा एक भी युवा नहीं मिला। बच्चों की बात तो कोसों दूर है। श्री वर्मा ने हालांकि नारायणपुर और होशंगाबाद में आश्रम के बच्चों को सिखाने का प्रयास किया था लेकिन बाद में बच्चों ने रूचि नहीं दिखाई। नारायणपुर के विवेकानंद आश्रम में नए सन्यासी के आते ही उनका प्रशिक्षण यह कहकर बंद करवा दिया गया कि पढ़ाई का नुकसान हो रहा है। श्री वर्मा के मुताबिक जब वे 35 वर्ष के थे तब उन्होंने उत्तरप्रदेश के गुरुकुल आश्रम कांगड़ी के बालकृष्ण शर्मा से धर्नुविद्या सीखी थी। तब वे भजन का प्रचार  करते थे और नाचा-गम्मत जैसी लोक कलाओं का प्रदर्शन करते थे। इसके बाद उन्होंने कई जगह प्रदर्शन  किया। राज्य निर्माण के बाद 2007 में जब उन्होंने यहां साइंस कालेज मैदान में प्रदर्शन किया था तो स•ाी हैरत में पड़ गए थे। राजधानी के राजकुमार कालेज में भी उन्होंने प्रदर्शन दिखाया था। श्री वर्मा शब्दभेदी बाण के अलावा धागे को काटने, आंखों में पट्टी बांधकर तीर निशाने पर लगाने, सोकर, उलटा लेटकर, दर्पण में देखकर सटीक निशाना लगाने में माहिर हैं। लेकिन 86 साल की इस उम्र में उनके घुटने ने जवाब दे दिया है और यही वजह है कि अब यह विद्या न तो वे सिखा सकते हैं और न तो कोई उन्हें इस लायक शिष्य मिला। वे बताते हैं कि उनके परिवार के सदस्यों ने भी इस ओर कोई विशेष उत्साह नहीं दिखाया। वे कहते हैं कि उनकी धर्नुविद्या को सीखकर आधुनिक तीरंदाजी में कोई भाग्य  आजमाता तो निश्चय ही अंतरराष्ट्रीय पदक हासिल कर सकता था।

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