07 अप्रैल, 2011

खेलों को भी जरूरत है अन्ना हजारे की. . .


इस देश को भ्रष्ट्राचार से मुक्ति दिलाने सड़क की लड़ाई लड़ रहे प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे को शत-शत प्रणाम, चलो किसी ने तो पहल की करप्शन रूपी इस दानव को खत्म करने की। दानव तो सतयुग में भी थे लेकिन वे प्रत्यक्ष थे और इनके अंत के लिए देवताओं को भी प्रत्यक्ष ही लड़ाई लड़नी पड़ती थी। कलयुग में भी दानव होते हैं लेकिन वे करप्शन के समान कभी टेबल के नीचे तो कभी कोंटे में छिपकर देशवासियों पर हमला बोलते हैं। करप्शन कहां नहीं है, हर शहर और हर गांव ही नहीं बल्कि गली-कूचे तक पहुंच गया है। ऐसे में भला खेल का मैदान कैसे पीछे रह सकता है जो आज तक कामनवेल्थ गेम्स के घोटालों से उबर नहीं सका है। सच पूछिए तो खेल के मैदान से भ्रष्ट्राचार को हटाने के लिए भी अन्ना हजारे की जरूरत है। खेल में क्या भ्रष्ट्राचार नहीं होता बल्कि यह आम कहावत हो चली है कि जितनी राजनीति खेल में होती है उतनी तो राजनीति में भी नहीं होती। इसी राजनीति के पीछे भ्रष्ट्राचार का दानव भी पल रहा होता है। क्या घोटाले सिर्फ कामनवेल्थ गेम्स और झारखंड नेशनल गेम्स में ही होते हैं? नहीं, बल्कि देश के हर राज्य के खेल जगत में होते रहे हैं। मामला किसी खिलाड़ी को टीम इंडिया में शामिल करने का हो या फिर किसी राज्य या राष्ट्रीय स्पर्धाओं की मेजबानी करने के लिए अनुदान के तौर पर मिलने वाली लाखों रुपए की राशि के दुरुपयोग करने का। स्कूली खिलाड़ियों को ही ले लीजिए। आज भी राष्ट्रीय स्पर्धाओं में वे शिरकत करने जाते हैं तो बिना किसी रिजर्वेशन के एक ही डिब्बे में ठसा-ठस वे राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं और थक-हार कर पहुंचते ही खेलने की मजबूरी लिए पराजय का मुंह देखकर वापस लौट आते हैं। क्या यह भ्रष्ट्राचार नहीं है? खेल के मैदान से जुड़ा हर शख्स जानता है कि आयोजनों और ताम-झाम में लाखों रुपए खर्च करने से खिलाड़ी तैयार नहीं होते बल्कि खिलाड़ी मैदान, खेल उपकरण और ट्रेनिंग की बेहतर से बेहतर सुविधाओं से तैयार होते हैं। फिर भी आयोजन होते हैं। क्या यह भ्रष्ट्राचार नहीं है? हर खेल विशेषज्ञ और खेल अधिकारी भी यह जानता है कि राज्य के सभी जिलों और विकासखंडों में 99 फीसदी राज्य खेल संघों की इकाई नहीं है, फिर भी उन्हें मान्यता और लाखों रुपए का अनुदान मिलता है जिसका कोई हिसाब नहीं। क्या यह भ्रष्ट्राचार नहीं है? नेता, मंत्री, अफसर सभी खेल संघों पर कब्जा जमाए बैठे हैं क्योंकि उनके अपने निजी स्वार्थ हैं, क्या यह भ्रष्ट्राचार नहीं है। छत्तीसगढ़ के खेल जगत में ही जितना पैसा इन दस सालों में आयोजनों और ताम-झाम में बहा दिया गया, उतना खेल के मैदानों और अधोसंरचनाओं में बहाया जाता तो इस राज्य की तस्वीर ही कुछ और होती। यह तो बेहतर है कि मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ के खेल जगत के लिए खुले दिल से खजाना खोला है और उद्योगों के साथ खेल संघों को जोड़कर सभी को लखपति बना दिया है। लेकिन हम मुख्यमंत्री डा. सिंह का ओलंपिक में स्वर्ण, रजत या कांस्य हासिल करने का सपना पूरा नहीं कर सके। फिलहाल तो अन्ना हजारे जैसे समाजसेवियों की जरूरतें देश-प्रदेश के खेल जगत को भी है जिससे पाक समझे जाने वाले इस क्षेत्र को नापाक इरादों से बचाए रख सकें।

 

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