02 जनवरी, 2011

बेटियां भी दिला सकती हैं ओलंपिक पदक






देश की दिग्गज महिला तीरंदाजों ने परिवार 
 की मानसिकता बदलने पर दिया जोर

दक्षिण-पूर्व मध्य रेलवे की  मेजबानी में  जनवरी से राजधानी में पहली बार आयोजित होने वाली आल इंडिया इंटर रेलवे आरचरी चैंपियनशिप में हिस्सा लेने पहुंची देश की  स्टार महिला तीरंदाजों ने परिवार की  मानसि·ता बदलने पर जोर दिया है और कहा है की बेटियां भी ओल्य्म्पिक  में पदक  दिला सकती हैं। इसके लिए चाहिए परिवार से पूरी आजादी और सहयोग। लंदन ओलंपिक  में देश के  लिए पदक  जीतने की तम्मना ·रने वाले साउथ ईस्टर्न रेलवे के  इन स्टार खिलाडिय़ों ने तीरंदाजी में भी आईपीएल की  तर्ज पर लीग ·रने पर जोर दिया है जिससे इस खेल को भी बढ़ावा मिल सके।
रायपुर। कामनवेल्थ गेम्स में देश के  लिए पदक जीतने वाली अर्जुन अवार्डी डोला बेनर्जी ने यहां डब्ल्यूआरएस मैदान में पत्रकारों से कहा की पुरुष खिलाडिय़ों  की तुलना में महिला खिलाडिय़ों को ज्यादा  परेशानियों का सामना करना पड़ता है, मौजूदा समय में लड़कीया  ही देश के लिए सबसे ज्यादा पदक जीत रही हैं। डोला का कहना है की कामनवेल्थ गेम्स में भी  सर्वाधिक पदक  लड़कीयों ने हासिल किये  हैं और यदि परिवार का  पूरा सहयोग मिले तो बेटियां ओलंपिक में भी पदक  जीत सकती हैं। डोला दो  टूक पत्रकारों से कहती हैं-मैं पूछती हूं की  आप स्वयं की बेटी को क्यों नहीं खेल में डालते? हमें अपनी सोच बदलनी होगी तभी  लड़कियां खेलों में आगे बढ़ेंगी और बेहतर परिणाम देंगी। एशियन गेम्स में  भी  बेहतर रिजल्ट दिया है। यदि में ओलंपिक  में पदक  चाहिए तो परिवार के  लोगों को  अपनी सोच बदलनी होगी। डोला की  इस बात का कामनवेल्थ गेम्स में देश के  लिए स्वर्णिम उपलब्धि हासिल करने वालीं साउथ ईस्टर्न रेलवे की  एल बुम्बइया,  रीना, रेणु और सुषमा ने भी  समर्थन किया  साथ में डोला के  छोटे भाई और पदक  विजेता राहुल बेनजी तथा ओलंपियन मंगल सिंह चाम्पइया ने भी कहा की  मौजूदा समय में हमें अपनी सोच में बदलाव की  जरूरत है। डोला और बुम्बइया ने कामनवेल्थ गेम्स में मिली उपलब्धियों को लेकर कहा की हमें मेजबान होने के नाते और ·कोरिया व जापान जैसी दिग्गज टीमों के नहीं आने की  वजह से काफी लाभ  मिला। ये टीमें आतीं तो हमारा प्रदर्शन प्रभावित हो सकता था। उन्होंने कहा की इन टीमों के पास हमसे बेहतर सुविधाएं रहती हैं, वह ज्यादा से ज्यादा स्पर्धाएं खेलने का  मामला हो या फिर इंफ्रास्ट्रक्चर की  सुविधाओं का.  इन खिलाडिय़ों ने कहा की देश के  हर राज्य में खेल की  बेहतर अधोसंरचना मिल जाए तो खेलों का काफी विकास होगा और ओलंपिक  में सर्वाधिक  पदक जीतने का  सपना भी  साकार हो सकेगा। रीना कुमारी, रेणु, राहुल बेनर्जी, सुषमा और ओलंपियन मंगल सिंह इस बात पर ज्यादा जोर देते हैं की जिस तरह कामनवेल्थ गेम्स के लिए लंबा कैंप  चला उसी तरह वल्र्ड कप और ओलंपिक के लिए भी लंबा कैंप चलना चाहिए। इसका पूरा फायदा खिलाडिय़ों को मिलता है। कामनवेल्थ गेम्स में बेहतर प्रदर्शन की सबसे अहम वजह दीर्धकाल तक लगने वाला कैंप भी था। इन खिलाडिय़ों ने तीरंदाजी को बढ़ावा देने के  लिए स्कूल  स्तर से इस खेल को बढ़ावा देने पर जोर दिया।


अंतरराष्ट्रीय कोच दिखावे का न हो
अंतरराष्ट्रीय तीरंदाजों का कहना है की आज फारेन कोच की मांग ज्यादा की  जाती है लेकिन यह पहले देखना जरूरी है की अंतरराष्ट्रीय कोच सिर्फ दिखावे का है या फिर कम का। अंतरराष्ट्रीय कोच से जरूर फायदा मिलता है लेकिन ऐसे कोच चाहिए जो अपनी प्रतिभा के दम पर खिलाडिय़ों को ऊपर तक  ले जाएं। कोच केवल नाम का नहीं होना चाहिए, कम का भी होना चाहिए.





कौन जानता  है पुरुष टीम रैंकिंग में नंबर वन है..


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अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज राहुल बेनर्जी कहते हैं कि मीडिया ने जितना प्रमोट क्रिकेट को किया है उतना दूसरे खेलों को नहीं। अब हमें ही देख लीजिए, देश की पुरुष टीम रैंकिंग में विश्व में नंबर वन पर है लेकिन कौन जानता है, लेकिन क्रिकेट में जरा सा  रैंकिंग में उतार या चढ़ाव होता वह खबरें प्रमुखता के साथ प्रकाशित होती हैं।अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता तीरंदाजों का कहना है कि देश में जिस तरह क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का आयोजन होता है, उसी तर्ज पर आरचरी में  एपीएल या फिर आरपीएल जैसी कोई स्पर्धा का आयोजन होना चहिए। इस खेल को  बेहतर प्रायोजकों की जरूरत  है। राहुल बेनर्जी और डोला बेनर्जी ने कहा कि कई दूसरे खेलों में प्रीमियर लीग की शुरुआत हो चुकी है, आरचरी में भी  होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए यह जरूरी  है कि मीडिया हमें पूरा सहयोग करे। क्रिकेट को लाइव दिखाया जाता है और पल-पल की जानकारी दी जाती है लेकिन आरचरी में ऐसा नहीं होता। जिस तरह क्रिकेट को एक्सोपज किया जाता  है उसी तरह तीरंदाजी को भी एक्सपोज करने की जरूरत है। हां, कामनवेल्थ गेम्स ने आज देश के लोगों पर काफी प्रभाव डाला है। लोगों ने करीब से तीरंदाजी सहित कई और खेल को समझा और जाना है। हमें इस  बात की खुशी होती थी कि लोग कामनवेल्थ गेम्स के आयोजन के  दौरान क्रिकेट की बजाए पदक तालिका पर नजरें टिकाए रहते थे। इन खिलाड़ियों ने कामनवेल्थ गेम्स में सामने आए
भ्रष्ट्राचार को लेकर कहा कि खिलाड़ियों को अपने खेल से ज्यादा मतलब होता है और वैसे भी  हमें और दूसरे देश के खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिलीं थीं और ऐसा नहीं लग रहा था कि कुछ भ्रष्ट्राचार हुआ होगा।

मायने रखती है सुंदरता...





अंतरराष्ट्रीय तीरंदाजों की मानें तो खेलों में भी अब सुंदरता घर कर गई है और यह काफी मायने रखने लगी है। ओलंपियन मंगल सिंह, राहुल बेनर्जी और कई महिला खिलाड़ी  मानती हैं कि खेलों में सुंदरता का महत्व बढ़ने लगा है। टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की रैंकिंग भले ही सौ से भी नीचे  पहुंच गई हो लेकिन उसकी खबरें प्रमुखता से मीडिया में आती है लेकिन हमारी रैंकिंग पर किसी की नजर नहीं जाती।

खेल में भी है बेहतर करियर




एसईसीआर रेलवे और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले तीरंदाजों में से कई ने हाल ही में रेलवे में नौकरी हासिल की है। इन खिलाड़ियों का कहना है कि खेल में भी काफी बेहतर करियर होता है और इसे गंभीरता से लेना चाहिए। वह एशियन गेम्स में तीन कांस्य पदक हासिल करने वालीं रिमिल हों या व्यक्गित इवेंट की गोल मेडलिस्ट नमिता यादव, मानती हैं कि खेल को गंभीरता से लें तो करियर भी है। आल इंडिया इंटर रेलवे आरचरी प्रतियोगिता में शिवनाथ नगेशिया, साउथ सेंट्रल रेलवे के जे रामाराव, बी प्रणिता, लक्ष्मी रानी मांझी, रुशाली बोरले भी हिस्सा ले रही हैं। इनमें से कई खिलाड़ी ओलंपिक 2012 के लिए इस साल क्वालीफाई राउंड में अपना भाग्य आजमाएंगे। रिकर्ब और कंपाउंड इवेंट के इन खिलाड़ियों का कहना है कि उन्हें परिवार का पूरा सहयोग मिलता जिसकी बदौलत वे यहां तक पहंचे हैं। इन्होंने कहा कि रेलवे हमें वह सारी सुविधाएं दे रही है जो एक खिलाड़ी को आगे बढ़ने के लिए चाहिए होती है। खिलाड़ियों ने कहा कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा काम्पटिशन मिलने चाहिए जिससे वे आगे बढ़ सकें।


सभी के आदर्श लिम्बाराम



लगभग  सभी  दिग्गज तीरंदाजों ने अपना आदर्श लिम्बाराम को माना है और कहा है कि जब से उन्होंने विधिवत आरचरी के क्षेत्र में कदम रखा लिम्बाराम का नाम सुना है। न सिर्फ पुरुष बल्कि महिला खिलाड़ियों ने भी लिम्बाराम को अपना आदर्श बताया और कहा कि उन्हें लिम्बाराम की तरह ख्याति हासिल करनी है और देश के लिए ओलंपिक पदक हासिल करना है। 2006 में जूनियर वर्ल्ड कप का गोल्ड मेडल जीत चुके पल्टन हासदा और तीन बार नेशनल चैंपियन का रिकार्ड बना चुके झारखंड के शिवनाथ नगेशिया सहित डोला बेनर्जी, राहुल बनेर्जी और कई खिलाड़ियों ने लिम्बाराम को अपना माडल बताया। सामने आई कि जब वे अपना प्रदर्शन कर रहे थे तब दर्शक दीर्धा से ज्यादा शोरगुल हो रहा था। इससे भारतीय तीरंदाजों का प्रदर्शन काफी प्रभावित् हुआ। इस मुद्दे को लेकर डोला बेनर्जी ने कहा कि बीजिंग ओलंपिक में यह बात सामने आई थी लेकिन यह गेम प्लान होता है। कोरिया और चाइना जैसी टीमें ऐसी परिस्थिति पैदा कर सकती हैं जिसका प्रभाव  दूसरे देश की टीमों पर पड़ता है। जहां इवेटं होने हैं वहां ये टीमें पहले से बेहतर अभयास कर लेती हैं लेकिन हमारे सामने परिस्थितियां दूसरी होती हैं। इसके अलावा जब हम प्रदर्शन कर रहे हों तो दर्शक जानबूझकर चिल्लाकर हमारा ध्यान भटकाएं, यह गेम प्लान का एक हिस्सा होता है।